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Sunday, December 29, 2013

भ्रष्टाचारण – ये कौन बोला

भ्रष्टाचारण – ये कौन बोला


दिल्ली में आजकल हरकोई भ्रष्टाचार की बात कर रहा है। अनके लोग भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं और कुछ और ज्यादा लोग भ्रष्टाचार उन्मूलन की बात कर रहे हैं। हरकोई चर्चा में भाग लिए जा रहा है। भ्रष्टाचार उन्मूलन जैसे नया नारा बन गया हो। भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न बातें कर रहे हैं।

जहाँ कहीं भी सँसाधन की उपलब्धता माँगने वालों से कम होती है और उन कम सँसाधनों का बँटवारा स्वयँ एक समस्या बन जाती है वहाँ इस बँटवारा समस्या को भ्रष्टाचार के नियमों से हल किया जाता है।

·       जब राशन कम हो और राशन कार्ड अधिक हों और उद्देश्य राशन पाना हो
·       जब लाईन लंबी हो और आपके पास समय कम हो और उद्देश्य काऊँटर पर पहुँचना हो
·       जब सीटें कम हों और एडमिशन चाहने वाले ज्यादा हों और उद्देश्य एडमिशन पाना हो

ऐसे अनेक दृष्टाँत हो सकते हैं। समस्या कैसे सुलझाई जाए? इन सब बातों में एक मात्र उपाय अपने स्थान को सुरक्षित करना होता है।

कुछ सिद्धाँतकार ऐसे में किसी नियम जैसे कि मैरिट-लिस्ट आदि के द्वारा समाधान का सुझाव दे सकते हैं। लेकिन इस उन लोगों को कैसे संतुष्ट करें जो मैरिट-लिस्ट से बाहर रह गए हैं, जो असफल हो गए हैं। उन्हें असँतोष होता है। यह असँतोष तब अधिक भीषण होता है जब बाहर रह गए लोग अधिक साधनसम्पन्न हों। यह समस्या का यथार्थ रूप है। सफलता के आकाँक्षी लोगों को असफलता का स्पष्टीकरण (जैसा कि मैरिट-लिस्ट) नहीं चाहिए बल्कि सफलता की प्राप्ति चाहिए। उन्हें अपनी सीट चाहिए। बस यहीं से भ्रष्टाचारण का विचार पनपता है।

जिस बात को लोग भ्रष्टाचारण कह रहे हैं वह एक पूरा दर्शन(शास्त्र) है उसे सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। और यह दर्शन ऐसे है कि संसाधनों को विश्व – विजयी होना चाहिये। उसे सबसे ऊपर यहाँ तक कि मैरिट से भी ऊपर होना चाहिए। इसके लिए संसाधनों का एक भाग सिर्फ इस लिये व्यय कर दिया जाता है ताकि शेष संसाधन सर्वोच्च शिखर पर विराज सकें। इसी शिखर पर सीट और सफलता रहते हैं।

मुद्दा यह है कि भ्रष्टाचारण को किस दृष्टि से देखा जाता है। सर्वप्रथम तो इसे इसके दार्शनिक परिप्रेक्षय में समझा जाना चाहिये। अलग अलग स्थितियों में यह अलग अलग नजर आता है। यदि यह किसी की सहायता करता है तो वह इसका चयन कर लेता है और अगर यह प्रतिद्वंद्वी की सहायता करता है तो इसकी आलोचना की जाती है। भ्रष्टाचारण के प्रति आपका नज़रिया मूलतः इसके द्वारा पड़ने वाले प्रभाव से तय होता है। यह तरीका – सुविधामूलक आलोचना कहलाता है।

इस देश-काल में भ्रष्टाचारण के प्रति कही जा रही उग्र और भीषण बातें मुख्यतः इसी सुविधामूलक आलोचना से पैदा हुई बातें हैं। दिल्ली में, या फिर कहें कि पूरे समाज में ऐसे कितने मातपिता हैं जो स्कूल से दूरी के नियमों का उल्लँघन करके भी अपने बच्चों का दाखिला किसी प्रतिष्ठित स्कूल में करवाने से खुद को रोक पाएँगे। कितने लोग होंगे जो ड्राईविंग लाइसेंस के लिए कुछ रुपये खर्च करने की बजाए सब कागजातों और मेडिकल चैकअप के चक्कर में पड़ना चाहेंगे?

मेरा काम पहले हो जाए, सुविधा से हो जाए, बिना किसी ज़रब पड़े हो जाए – इसके लिए थोड़ा बहुत खर्च भी करना पड़े तो कोई बात नहीं। आराम के लिए ही तो कमाते हैं। यह सोच ही संसाधन सम्पन्न सोच है। यही सोच नियमों के उल्लँघन को प्रेरित करती है। परन्तु यह सोच बहुत स्वभाविक है। जैसे जैसे व्यक्ति आर्थिक प्रगति करता है वैसे वैसे वह अपने समय का आर्थिक आकलन करने लगता है। यदि किसी निश्चित समय में व्यक्ति घूस की रकम की तुलना में अधिक आय अर्जित कर सकता है तो वह घूस का सहारा लेता है। यह स्वतः उपजा हुआ भ्रष्टाचारण है। यह कर्ता के द्वारा खुद किया जाता है।

यह घूस का सवाल तब और मुश्किल बन जाता है जब किसी अवसर के लिए एक से अधिक प्रतिद्वंद्वी हों। यदि ये प्रतिद्वंद्वी समान रूप से योग्य हों, मैरिटधारी हों तो प्रश्न और अधिक ज्वलँत बन जाता है। मानवीय स्वभाव के अनुसार वाँछित परिणाम के लिए सभी प्रतिद्वंद्वी पूरा प्रयास करेंगे। प्रयासों की यह आवश्यकता ही उन कामों की जननी है जिन्हें आजकल कुछ लोग भ्रष्टाचारण कह रहे हैं।

आजकल कुछ लोग मीडिया में छाए हुए हैं। वे लोग भ्रष्टाचारण को खत्म करने का आश्वासन दे रहे हैं, हुँकार भर रहे हैं। उन लोगों को बताना चाहिए कि ऐसा करके वे क्या कहना चाह रहे हैं? क्या वे कह रहे हैं कि वे किसी भी कीमत पर सफल होने की मानवीय जिजिविषा को रोकने की बात कह रहे हैं? क्या वे ज्ञात इतिहास के मानवीय विकास-क्रम को मोड़ देने की बात कर रहे हैं। या वे जनता को मात्र बहका रहे हैं।

ऐसे ज्ञानियों में से कुछ को लग सकता है कि  यह लेख उक्त भ्रष्टाचारण की प्रशँसा कर रहा है। ऐसा नहीं है। यह लेख भ्रष्टाचारण की ना तो प्रशँसा करता है ना ही निँदा। यह तो भ्रष्टाचारण को समझने की कोशिश करता है। यह उन दावों और वादों को भी समझने की कोशिश करता है जो बिना समझे बूझे ही भ्रष्टाचारण के सम्बंध में किये जा रहे हैं।

भ्रष्टाचारण एक मानवीय प्रवृत्ति है, यह जन्मजात है, यह जिन्दा रहने की ललक का नतीजा है, यह ऊँचाई की दौड़ में सर्वोच्चता पाने की चाहत की बुनियाद पर खड़ी है। आज का सिस्टम इस मानवीय प्रवृत्ति को एक बुरा नाम – भ्रष्टाचारण देता है। पता नहीं भविष्य क्या करेगा। हो सकता है यह प्रवृत्ति उपयोगी हो, पीड़ादायक हो, छलावा हो, निर्णायक हो, उत्तेजक हो, आनन्ददायी हो, शूलकारक हो – जो भी हो यह एक मानवीय आदिम प्रवृत्ति है और इसके बिना मानव नाम का यह जीव इस विकास अवस्था तक नहीं आ सकता था। इस प्रवृत्ति को इसी रूप में समझा जाना चाहिए।

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Thursday, December 26, 2013

Rajkumar Kejri

एक आवत एक जात

कबीर के दो दोहे हैं

पतझड़ आ गया है। पत्ते झड़ने लगे हैं। नीचे गिरते हुए पत्ते बहुत डिप्रैस्ड फ़ील कर रहे हैं। एक पत्ता आखिरकार कह ही उठता है

पत्ता बोला पेड़ से सुनो वृक्ष बनिराइ
अबके बिछड़े ना मिलैं दूर पड़ेंगे जाइ।।

सनातन वृक्ष के लिए पत्तों का आना जाना उतना सीमित अनुभव नहीं है। वह अनेक पतझड़ और वसन्त देख चुका है। वह इस निरन्तरता को पहचानता है। वृक्ष ने उत्तर दिया

वृक्ष बोला पात से सुन पत्ते मेरी बात
इस घर की यह रीत है एक आवत एक जात।।

अतः यहाँ से इति AAP कथा – राजकुमार केजरी


भारतीय राजनीति को गौर से देखने वाले जानते हैं कि राज्यों का भारत में विलय, चीनी आक्रमण, नेहरू-निधन, कामराज प्लान, कांग्रेसी सिंडिकेट, संविद सरकारें और इंदिरा का उदय भारतीय राजनीति के मील के पत्थर तो हैं लेकिन युगाँतरकारी घटनाएँ नहीं है। इन घटनाओं पर भारतीय इतिहास ने करवटें तो बदली परन्तु राजनीति की धमनियों में वही खून दौड़ा किया।

लेकिन सन् पिच्छत्तर की इमरजैंसी ने जैसे पिछले पाँच हजार साल से सोते भारत को झकझोर दिया था। विपक्ष ने इमरजैंसी की अ-लोकताँत्रिक छवि की बहुत आलोचना की है। काँग्रेस ने उस निर्णय का बचाव किया है। इस राजनीतिक प्रशँसा-आलोचना से परे उस इमरजैंसी ने भारत के जनमानस को सोते से जगाया था। जागने पर जनता ने अँगड़ाई ली और अँगड़ाई लेते लेते 1977 आ गया था। तब भारत की उस निरीह जनता ने जो पाठ महात्मा गाँधी से पढ़ा था उसे दोहरा दिया। एक स्थापित साम्राज्य 1947 में चूर हुआ था दूसरा तीस बरस बाद 1977 में हो गया। वह भारतीय संदर्भों में हुई एक रक्तहीन रूसी क्राँति थी। तत्कालीन लेखों में लिखा गया कि 60 बरसों के बाद रूसी क्राँति भारत में घटित हो गई थी। परन्तु यह इतनी भर ना थी। रूसी क्राँति एक दिशा में चलने वाली रेल थी तो भारतीय क्राँति उससे अधिक व्यापक और गहन अर्थों वाली थी। इसके ये अर्थ और व्यापकता आने वाले वर्षों में साबित हुए। इसलिए भारत के राजनीतिक इतिहास को लिखते समय 1975 का साल बिना किसी हानि के एक रेफरैंस प्वाइँट के रूप में लिया जा सकता है। यहाँ इस लेख में समय की गणना साल 75 से ही की गई है।
… …
केजरीवाल ने जनता से वादे किये। उन्होंने जनता को कहा कि पुराने राजनीतिज्ञों का यकीन ना करो क्योंकि वे झूठ बोलते हैं। उन्होंने बहुत बेझिझक अँदाज में कहा कि वर्तमान राजनीति में जो लोग उनके साथ हैं सिर्फ वे ही ईमानदार हैं शेष सब बेईमान हैं। इतना ही नहीं उन्होंने एक ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया जो बिल्कुल नई थी और जिसे याद करने के लिए भी दोहराया नहीं जा सकता। तमाम परिभाषित रूपों को तोड़ दिया गया। उनके साथ चलने वाले और स्वयँ को उच्च साहित्यकार कहने वाले लोगों ने तो ऐसे ऐसे भाषिक प्रयोग किये कि मदिरा पान के बाद सड़क पर लड़ने वाले यौद्धाओं ने भी दाँतो तले उँगलियाँ दबा ली थीं। समसामयिक सिनेमा का प्रभाव कहये या कुछ और कहिये लोगों को यह केजरीवाल – आल्हा बहुत पसँद आई और उन्होंने उसे बहुत ध्यान और चाव से सुना। अपने वोट के रूप में सकारात्मक उत्तर भी दिया। आज केजरीवाल बाबू पर सत्ता का चँवर डुलाया जा रहा है।

जैसा 1977 में भारतीय-काँग्रेस ने महसूस किया था वैसा ही 2013 में दिल्ली-काँग्रेस ने महसूस किया। अन्य विपक्षी दल भाजपा सदमा, राहत, हैरानी, घात और किंकर्त्तव्यविमूढ़ता (दुविधा) के मिले जिले भावों से ग्रस्त है। उससे ना बोलते बन पड़ रहा है और ना ही चुप रहते।
… …
ऐसे में नीले आसमान में सफेद घोड़े पर बैठा यह केजरीवाल नाम का राजकुमार जिस जादू की छड़ी को हिला कर भारत के समाज को बदलने की घोषणा कर रहा है वह कितनी विश्वसनीय है यह एक ऐसा सदका है जिस आने वाला समय बहुत जल्द जनता के सामने उतारने वाला है। लेकिन इसे सिर्फ़ समय के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। इसका क तार्किक आकलन आवश्यक है।

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Tuesday, December 17, 2013

PS Malik: Politics and Policies: AAP की सरकार – यह प्रश्न है, दुविधा है या मैलोड्रा...

AAP की सरकार – यह प्रश्न है, दुविधा है या मैलोड्रामा


AAP की सरकार – यह प्रश्न है, दुविधा है या मैलोड्रामा है

आप ने कहा है कि वह काँग्रेस के समर्थन से सरकार बनाये या नहीं इस बात का फैसला करने के लिये वे लोग जनता के बीच जाएँगे। एक कागज़ दिखाया जा रहा है जिसकी 25 लाख प्रतियाँ बँटवाई जाएँगीं और जनता से कहा जाएगा कि वे सरकार बनाने या ना बनाने को लेकर अपना मत दें।
इस आम चुनाव में काँग्रेस हार गई थी। उसे मात्र 8 सीटें मिलीं। लेकिन काँग्रेस ने साबित कर दिया है कि वह भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनुभवी पार्टी है। उसने हारकर भी यह चुनाव जीत लिया है। उसने अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी भाजपा को दिल्ली की गद्दी से दूर रखने में निस्संदेह सफलता हासिल कर ली है। और जिस व्यक्तिमूलक पार्टी ने उसे हराया था उसी व्यक्तिमूलक पार्टी को उसने अपनी बैसाखियाँ लेने को मजबूर कर दिया है। यह वस्तुतः वह सूत्र है जो समझाता है कि इतने विरोध और गंभीर आरोपों के बावजूद भी क्यों काँग्रेस की ग्राह्यता सब दलों से अधिक है।
भाजपा तो गद्दी छोड़कर एक तरफ़ खड़ी हो गई है परन्तु नवजात AAP के लोग कन्फ्यूज़ हो गए हैं। समर्थन की बात कहकर काँग्रेस ने उन्हें नागपाश से बाँध दिया है। ग़ालिब ने कहीं लिखा है
                        हुए हैं पाँव ही ज़ख्मी नबर्द ए ईश्क में ग़ालिब
                   ना भागा जाए है मुझसे ना ठहरा जाए है मुझसे

आज केजरीवाल से बेहतर इस शेर का मतलब और दूसरा कौन जानता होगा। AAP के भिन्न भिन्न क्षत्रप भिन्न भिन्न बातें बोल रहे हैं। कोई सभी विकल्पों की बात कर रहा है कोई काँग्रेसी इतिहास की बात कर रहा है और चँद्रशेखर सरकार के पतन की ओर इशारे कर रहा है। कुछ सूझ नहीं पा रहा लगता है। राजनीतिक सँवाद की भाषा निम्न से निम्नतर होती जा रही है और काँग्रेस एक हिमयति की तरह शाँत भाव से सुन रही है।
दिल्ली की जनता बौरा रही है। पहली बार उसे महसूस हो रहा है कि गम्भीर राजनीति और एक हास्य कवि सम्मेलन के बीच के एक मौलिक अँतर होता है और इसे सदैव बनाए रखा जाना चाहिये। कल उसके पास मतपत्र आए थे चुनाव के लिए और सुना है आज-कल में वो 25 लाख कागज आने वाले हैं जिन पर उनसे फिर पूछा गया है कि AAP क्या करे।
वैसे जनता को इतनी बावली क्यों समझा जा रहै है कि उसे यह भी याद नहीं कि AAP को विधान सभा में क्यों भेजा गया था। विगत् इतिहास में जनता को कभी इतना भुलक्कड़ नहीं समझा गया। और अगर किसी ने ऐसा करने की हिमाकत की तो उसे उसका खमियाजा भी भुगतना पड़ा – चाहे वह 1977 की काँग्रेस हो या 1979 की जनता पार्टी। 2013 की शीला सरकार का परिणाम भी यही दिखाता है।
थोड़ा सा पर्दा उठा कर देखें तो AAP का डरा हुआ चेहरा उजागर हो जाता है। अगर उनमें राजनीतिक शुचिता और मूल्यों की प्रतिबद्धता होती तो वे अपना स्टैण्ड ना बदलते और जैसा कि वे दूसरों को कहते हैं – सत्ता की भूख में सिद्धाँतों से समझौता ना करते। वे अपनी शुचिता पर अड़े रहते और पुनः चुनाव में जाकर पूर्ण बहुमत के साथ आते। पर उन्होंने शायद इतना सब्र और साहस नहीं दिखाया। उन्होंने नये परन्तु अवमूल्यीकृत सँवादों के द्वारा सत्ता के लिए अपनी चेष्टाओं पर रँग लीपना शुरू किया। वे भी वैसे ही रँगे प्राणी हो गये जैसों के विरुद्ध उन्होंने शँख बजाया था। ये क्या हो गया। और ये क्या होने जा रहा है। ये नए यौद्धा लोग गद्दी चाह भी रहे हैं और डर भी रहे हैं।
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AAP की सरकार – यह प्रश्न है, दुविधा है या मैलोड्रामा है

AAP की सरकार – यह प्रश्न है, दुविधा है या मैलोड्रामा है



आप ने कहा है कि वह काँग्रेस के समर्थन से सरकार बनाये या नहीं इस बात का फैसला करने के लिये वे लोग जनता के बीच जाएँगे। एक कागज़ दिखाया जा रहा है जिसकी 25 लाख प्रतियाँ बँटवाई जाएँगीं और जनता से कहा जाएगा कि वे सरकार बनाने या ना बनाने को लेकर अपना मत दें।

इस आम चुनाव में काँग्रेस हार गई थी। उसे मात्र 8 सीटें मिलीं। लेकिन काँग्रेस ने साबित कर दिया है कि वह भारतीय लोकतंत्र की सबसे अनुभवी पार्टी है। उसने हारकर भी यह चुनाव जीत लिया है। उसने अपने चिर प्रतिद्वन्द्वी भाजपा को दिल्ली की गद्दी से दूर रखने में निस्संदेह सफलता हासिल कर ली है। और जिस व्यक्तिमूलक पार्टी ने उसे हराया था उसी व्यक्तिमूलक पार्टी को उसने अपनी बैसाखियाँ लेने को मजबूर कर दिया है। यह वस्तुतः वह सूत्र है जो समझाता है कि इतने विरोध और गंभीर आरोपों के बावजूद भी क्यों काँग्रेस की ग्राह्यता सब दलों से अधिक है।

भाजपा तो गद्दी छोड़कर एक तरफ़ खड़ी हो गई है परन्तु नवजात AAP के लोग कन्फ्यूज़ हो गए हैं। समर्थन की बात कहकर काँग्रेस ने उन्हें नागपाश से बाँध दिया है। ग़ालिब ने कहीं लिखा है

हुए हैं पाँव ही ज़ख्मी नबर्द ए ईश्क में ग़ालिब
ना भागा जाए है मुझसे ना ठहरा जाए है मुझसे

आज केजरीवाल से बेहतर इस शेर का मतलब और दूसरा कौन जानता होगा। AAP के भिन्न भिन्न क्षत्रप भिन्न भिन्न बातें बोल रहे हैं। कोई सभी विकल्पों की बात कर रहा है कोई काँग्रेसी इतिहास की बात कर रहा है और चँद्रशेखर सरकार के पतन की ओर इशारे कर रहा है। कुछ सूझ नहीं पा रहा लगता है। राजनीतिक सँवाद की भाषा निम्न से निम्नतर होती जा रही है और काँग्रेस एक हिमयति की तरह शाँत भाव से सुन रही है।
दिल्ली की जनता बौरा रही है। पहली बार उसे महसूस हो रहा है कि गम्भीर राजनीति और एक हास्य कवि सम्मेलन के बीच के एक मौलिक अँतर होता है और इसे सदैव बनाए रखा जाना चाहिये। कल उसके पास मतपत्र आए थे चुनाव के लिए और सुना है आज-कल में वो 25 लाख कागज आने वाले हैं जिन पर उनसे फिर पूछा गया है कि AAP क्या करे।

वैसे जनता को इतनी बावली क्यों समझा जा रहै है कि उसे यह भी याद नहीं कि AAP को विधान सभा में क्यों भेजा गया था। विगत् इतिहास में जनता को कभी इतना भुलक्कड़ नहीं समझा गया। और अगर किसी ने ऐसा करने की हिमाकत की तो उसे उसका खमियाजा भी भुगतना पड़ा – चाहे वह 1977 की काँग्रेस हो या 1979 की जनता पार्टी। 2013 की शीला सरकार का परिणाम भी यही दिखाता है।

थोड़ा सा पर्दा उठा कर देखें तो AAP का डरा हुआ चेहरा उजागर हो जाता है। अगर उनमें राजनीतिक शुचिता और मूल्यों की प्रतिबद्धता होती तो वे अपना स्टैण्ड ना बदलते और जैसा कि वे दूसरों को कहते हैं – सत्ता की भूख में सिद्धाँतों से समझौता ना करते। वे अपनी शुचिता पर अड़े रहते और पुनः चुनाव में जाकर पूर्ण बहुमत के साथ आते। पर उन्होंने शायद इतना सब्र और साहस नहीं दिखाया। उन्होंने नये परन्तु अवमूल्यीकृत सँवादों के द्वारा सत्ता के लिए अपनी चेष्टाओं पर रँग लीपना शुरू किया। वे भी वैसे ही रँगे प्राणी हो गये जैसों के विरुद्ध उन्होंने शँख बजाया था। ये क्या हो गया। और ये क्या होने जा रहा है। ये नए यौद्धा लोग गद्दी चाह भी रहे हैं और डर भी रहे हैं।

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Monday, December 16, 2013

उपवन प्रबंधन के बोझ से हाँफती तितलियों की व्यथा


परन्तु  दिल्ली की जनता अवाक् है। कुछ कहते नहीं बन रहा है। अनेक नए मतदाताओं ने इस बार एक निर्वाक् क्राँति Silent Revolution को वोट दिया था। बिना किसी शोर के दिल्ली की शासन धमनियों में एक नये रंग का रक्त प्रवाहित कर दिया था ताकि एक सड़े हुए सिस्टम का बोझ उसे और ना उठाना पड़े। लेकिन चुनाव परिणामों ने ना सिर्फ़ बोझ और अधिक बढ़ा दिया है बल्कि जो चेहरे तारनहार के रूप में अवतरित होकर सामने आए थे चुनावों के बाद उन चेहरों की आभा ही समाप्त हो गई है। वे चेहरे आभाहीन नज़र आ रहे हैं। जनता किंकर्त्त्तव्यविमूढ़ है, दुविधा में है, कन्फ्यूज़्ड है कि ऐसे में क्या करे। भरोसा चूर चूर हो गया लगता है।

आओ विचार करें।

सत्ता का स्वरूप राजनीतिक है राजनीति पर आधारित है। वैसे ही जैसे कि बाजार का स्वरूप मौद्रिक है मुद्रा (पैसे) पर आधारित है। यदि कोई सज्जन यह कहे कि उसे बाजार से कोई गुरेज़ नहीं है बस उसमें पैसे का चलन रोक दो। पैसा बुरा है। पैसा लोभ लालच की जड़ है। बाजार में से पैसा हटा दो तो मुझे बाजार स्वीकार है और मैं भी अपनी दुकान खोलने के लिये तैयार हूँ। तो ऐसे तर्क सुनकर विद्वान लोग उन सज्जन को कहते हैं कि आप को यदि पैसे से परहेज़ है तो बाजार में आते ही क्यों हो। दुकान खोलते ही क्यों हो। अध्यात्म में जाओ और आश्रम खोलो। दुकान मत खोलो।

ऐसे ही तर्क आजकल दिल्ली की हवाओं में तैर रहे हैं। हम सरकार बना सकते हैं यदि आप वादा करो कि आप कोई राजनीति नहीं करोगे। यदि आप वादा करो कि आप अपने आँख कान मूँदकर हमारे पीछे पीछे चलोगे। यदि आप वादा करो कि आप हमारी गालियों के जवाब में चुप रहोगे। गालियाँ तो हम आपको इस लिये देते हैं कि हम ईमानदार हैं और अन्य कोई ईमानदार नहीं है। वादा करो कि चुपचाप हमारी गालियाँ सुनते रहोगे और कभी पलटकर जवाब नहीं दोगे। अगर जवाब दे दिया तो हम सरकार नहीं बनाएँगे।

अब किसी दल को कोई समाधान सूझ नहीं रहा है। वे राजनीतिक दल हैं। राजनीति ना करें तो क्या करें। शासन समीकरणों द्वारा राजनीति ही उन दलों का आकार तय करती है। वे दल शासन का स्वरूप तय करते हैं। अब शर्त लगाई जा रही है कि आप राजनीति ना करें। तो ऐसे में वे दल क्या करें। अगर वे दल राजनीति ना करें तो फिर राजनीति कौन करेगा। आप तो ईमानदार हैं राजनीति करोगे नहीं तो क्या आप उसी राजनीति को समाप्त करना चाहते हो जो राजनीति आपके जन्म, वृद्धि और पराक्रम के लिये जिम्मेदार है। जो राजनीति आपको मुख्य पटल पर लाई वही आप बंद करवा रहे हैं तो फिर जनता का क्या होगा जिसके पास राजनीतिक पद्धति के रूप में मतदान सबसे बड़ा हथियार है। आपकी ये बातें तो उसी जनता के खिलाफ हैं जिसने आपके  लिये वोट किया था। क्या आप ऐसी बातें सोच समझ कर रहे हैं क्योंकि आपका दावा है कि आपसे बेहतर कोई अन्य नहीं सोच सकता है।

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Saturday, December 14, 2013

18 Conditions of AAP: पास करोगे तो ही परीक्षा दूँगा

18 Conditions of AAP: पास करोगे तो ही परीक्षा दूँगा


बच्चों के खेल में जिसके पास बैट या बॉल होती है वह खेल को शुरू करवाने के लिए अपनी शर्तें रखता है। पहले मुझे बैटिंग दोगे तो खेलूँगा। या मुझे बॉल धीमी फेंकोगे तो खेलूँगा। तेज बॉलिंग करोगे तो नहीं खेलूँगा। मुझे हाफ़ सेंचुरी से पहले आऊट करोगे तो अपना बैट वापिस ले लूँगा। आदि आदि।
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल कुछ ऐसा ही देखने में आ रहा है। विधानसभा में किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं आया। भाजपा के पास 32, AAP के पास 28 और काँग्रेस के पास 8 विधायक हैं। उपराज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित किया तो उसने अपनी असमर्थता जाहिर कर दी। इसके बाद एक राजनीतिक प्रहसन शुरू हो गया जिसे दिल्ली की जनता और प्रतिनिधि संभवतः पहली बार देख रहे हैं।
काँग्रेस ने बिना शर्त AAP को समर्थन की घोषणा कर दी। जवाब में AAP ने 18 शर्तों की फेहरिस्त जारी करके कहा कि यदि काँग्रेस और भाजपा इन 18 शर्तों को मानेंगे तो हम सरकार बनाएँगे वरना तो नहीं बनाएँगे। अभी तक राजनीति को गम्भीर कार्यों का स्थान समझा जाता है। कुछ लोगों को कहना है कि AAP की राजनीतिक विजय के पश्चात राजनीति में अगम्भीरता बढ़ी है। लोग कुछ भी अव्यवहारिक कह देने को सामान्य मानने लगे हैं।
राजनीति के विचारक पूछते हैं कि इन 18 शर्तों से बड़ा राजनैतिक मज़ाक और क्या हो सकता है। ये 18 शर्तें वे वायदे हैं जिन्हें AAP ने दिल्ली के जनता से किया था। इन 18 शर्तों को अगर वे अपने विरोधियों से पूरा करवाना चाहते हैं तो फिर वे स्वयँ क्या करेंगे। चुनावों में उनका वायदा था कि वे खुद इन 18 शर्तों को पूरा करेंगे। लेकिन अब वे इन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों के द्वारा पूरा करवाना चाहते हैं।
AAP का कहना है कि हमें इन 18 शर्तों को पूरा करके दोगे तो ही हम सरकार बनाएँगे। टीवी के कार्यक्रमों में आए एक विद्वान ने कहा कि ये नौसिखिये लोग हैं जो सरकार बनाने के लिए बालकों के खेल जैसी शर्तें रख रहें हैं। जनता के बीच काम करने से पहले ही ये अपने विरोधियों से इनके खिलाफ़ राजनीति ना करने का आश्वासन चाहते हैं। यह एक भयभीत दल का काम है। समरवीर यौद्धा इस तरह की पलायनवादी बातें नहीं करते कि परीक्षा में तभी बैठेंगे जब पास कराने का भरोसा दोगे।
पूछा जा रहा है कि यह राजनीति है या राजनीति के नाम पर वितंडा है।
 
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Wednesday, December 11, 2013

केजरीवाल का संघ या भाजपा के अन्ना

केजरीवाल का संघ या भाजपा के अन्ना


for an english version of this article please visit

An RSS of Kejriwal or Anna of BJP 

कई राजनीतिक पार्टियों के पीछे एक सामाजिक, धार्मिक या शैक्षिक आन्दोलन होता है। यह आन्दोलन उस पार्टी को बौद्धिक ख़ुराक़ देता है और पार्टी उस आन्दोलन को विस्तार हेतु एक आकाश देती है। वर्तमान समय में  भाजपा और ऱाष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मिसाल दी जा सकती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक आन्दोलन है और भाजपा एक पार्टी है। संघ भाजपा को एक सैद्धान्तिक दर्शन देता है और भाजपा संघ को एक राजनैतिक सुग्राह्यता देती है। इस लेख में इन उल्लिखित नामों के लिए प्रशंसा या आलोचना हरगिज़ नहीं है बल्कि यह तो दार्शनिक और क्रियात्मक पक्षों को दिखाने के लिये किया जाने वाला बौद्धिक प्रयास भर है।

अन्ना महाराष्ट्र में थे। अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में थे। अन्ना का दावा है कि वे वहाँ के एक आन्दोलन थे। और इस दावे की अपनी महत्ता है। केजरीवाल उन्हें दिल्ली लाये और उस आन्दोलन को काम करने का एक बड़ा कैनवस मिल गया। उसके बाद केजरीवाल अलग रास्ते चलते हुए एक पार्टी बन गये जबकि अन्ना वही आन्दोलन बने रहे। दोनों ने मजबूती से अपनी अपनी राहें थाम लीं और कहा कि वे अलग अलग हो चुके हैं।

उससे पहले जब वे दोनों ही आन्दोलन हुआ करते थे तब उन्होंने रामलीला मैदान का एक उपक्रम भी किया था जिसमें अन्ना का बहुत लंबा अनशन हुआ था। सरकार भी सहम गई थी और झोंक में सरकार ने उस आन्दोलन पर प्रहार कर दिया था। लेकिन तब तक दिल्ली के आम आदमी ने खुद को उस अन्ना नामक आन्दोलन से जोड़ लिया था। लोगों को लगा कि सरकार का प्रहार आन्दोलन पर नहीं बल्कि उन पर है। हुआ ये कि जनता ने खुद को आन्दोलन के पीछे लामबन्द कर लिया। 

बाद में जनता ने देखा कि पार्टी (केजरीवाल) और आन्दोलन (अन्ना) ने अलग अलग राहें पकड़ ली थीं। पार्टी (केजरीवाल) ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव लड़े और ऐतिहासिक जीत दर्ज़ की। दिल्ली की जीत के बाद पार्टी (केजरीवाल) ने घोषणा की कि उसका अगला पड़ाव महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई  है। और सब हैरानी से देखते हैं कि अचानक अगली सुबह महाराष्ट्र के गाँव रालेगण में अन्ना का अनशन शुरू हो जाता है।

क्या है यह सब?

क्या कोई आन्दोलन है जो छुपते छुपाते एक पार्टी की तरफ़दारी कर रहा है? क्या इस छुपम छुपाई का कोई सुनियोजित उद्देश्य है? इन बातों को जनता से छुपाया ही क्यों जा रहा है? वो भी उस जनता से – जिसने  उनके लोकपाल के लिए अपना खून और पसीना दोनों ही बहाये थे और इन आम चुनावों में उन्हें ऐतिहासिक जीत दिलाई थी।

दिल्ली, यहाँ तक कि पूरे भारत की जनता जानना चाह रही है कि यदि आप एक आन्दोलन हैं जो किसी एक पार्टी को पाल रहा है तो आपमें यह सब सार्वजनिक करने का साहस क्यों नहीं है। जनता यह भी नहीं जान पा रही है कि यदि आप एक पार्टी हैं और एक आन्दोलन के पके फल खाना चाह रहे हैं तो आपके बड़े बड़े दावों के बावजूद इसे सबके सामने मान लेने की हिम्मत आपमें क्यों नहीं है.

कम से कम भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने सैद्धाँतिक सम्बन्धों की स्वीकारोक्ति का साहस सदैव दिखाया है।

Sunday, December 8, 2013

दिल्ली चुनाव 2013: अमूर्त मुख भाजपा

दिल्ली चुनाव 2013:  अमूर्त मुख भाजपा

PS Malik


पाँच राज्यों के चुनाव हुए। नतीजे आए। उनकी घोषणाएँ हुईं। अब आगे सरकारों का गठन होगा। सब सामान्य लगता है। राजनीतिक विश्लेषक अपने अपने विश्लेषणों में जुट गए।
परन्तु दिल्ली में कुछ अलग हुआ; कुछ विचित्र हुआ। इसे दो रूपों में देख सकते हैं। पहला तो एक नई राजनीतिक ताकत के रूप में केजरीवाल का उदय है। केजरीवाल का इसलिये कि अपने गठन और उसके बाद के काल में यह आन्दोलन जो पहले अन्ना की छाया में खड़ा हुआ था बाद में केजरीवाल की परछाईं के रूप में बड़ा हुआ है। आप नाम की राजनीतिक पार्टी केजरीवाल की परछाईं ही है। यह केजरीवाल का ही निर्वैयक्तिक विस्तार है जिसमें कुछ अन्य चेहरे टाँके गए नजर आते हैं।

दिल्ली के चुनावों की दूसरी विस्मयकारी घटना है – भाजपा की विजय। मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा के वक्तों से लेकर दिल्ली भाजपा अपना कोई चेहरा ही नहीं बना पाई है। बल्कि पिछले कुछ समय से तो जिन चेहरों को दिल्ली भाजपा के सिंहासन पर बिठाया गया वे उसके सिर के ताज नहीं बन पाए सिर के बोझ जरूर बन गये थे। भाजपा को उन्हें खुद ही सिंहासन से दूर करना पड़ा। इस चुनाव 2013 में भी जनता ने उन चेहरों को नकार दिया। नतीजों में कहीं निचला क्रम ही उन चेहरों को मिल पाया।

जिन चेहरों को आगे करके इन चुनावों में दिल्ली भाजपा जनमत पाने को आई वे भी बहुत सकारात्मक नहीं थे। चमत्कारिक तो बिल्कुल नहीं थे जैसे कि केजरीवाल रहे और आप नाम की राजनीतिक पार्टी के रूप में उनका निर्वैयक्तिक विस्तार रहा। तो फिर भाजपा दिल्ली में चुनाव जीती क्यों?

चुनाव के तत्काल बाद मैं कई लोगों से मिला और जाना की उन्होंने किसे मत दिया और क्यों दिया। अनेक मतदाताओं ने बताया कि उन्होंने भाजपा को वोट दिया है। परन्तु अनेक मतदाता तो अपने निर्वाचन क्षेत्र के भाजपा प्रत्याशी का नाम भी नहीं जानते थे। उन्होंने भाजपा को वोट दिया था। इन चुनावों से पहले दिल्ली भाजपा का कोई जनआन्दोलन तो याद नहीं आता है। तब इस भाजपा वोट का आधार क्या था?

इसका उत्तर है – नरेन्द्र मोदी। चुनाव पूर्व में भाजपा का एक ही आन्दोलन याद आता है – नरेन्द्र मोदी। शायद पूरे देश के मतदाता को नरेन्द्र मोदी के रूप में एक नायक मिला है। उसी नायक की परछाईं जब दिल्ली पर पड़ी तो वह दिल्ली की गद्दी बन कर अवतरित हुई। दिल्ली की गद्दी दिल्ली भाजपा की कमाई नहीं है बल्कि मोदी की परछाईं का मूर्तिमान रूप है। ठीक वैसे ही जैसे कि आप नाम की राजनीतिक पार्टी की सीटें केजरीवाल की परछाईं का मूर्तिमान रूप है। इस प्रकार चुनाव 2013 दो व्यक्तित्वों का अभ्युदय है भारतीय कैनवस पर मोदी और दिल्ली के फ़लक पर केजरीवाल। दिल्ली में भाजपा लगभग बिना चेहरे मोहरे वाली सी है।

यह बिना चेहरे वाली दिल्ली भाजपा दिल्ली की गद्दी को प्राप्त को कर रही है पर इसका निर्वाह कैसे करेगी यह मूल प्रश्न है। अगर यह दिल्ली भाजपा जल्द ही एक सुन्दर जनग्राह्य रूप धारण नहीं करती है तो मोदी नामक जनआन्दोलन को नुकसान पहुँचा सकती है।


यह अमूर्त मुख भाजपा निकट भविष्य में दिल्ली में क्या करती है, कैसा रूप धरती है – इसकी प्रतीक्षा मोदी, केजरीवाल और दिल्ली के मतदाता सबको रहने वाली है।